Antarvedi

तुम रेगिस्तान की बरू जैसे

मैं समंदर का पानी,

फिसल जाते हो उंगलियों के बीच से,

मैं लहरों सी लौट आती..

कुदरत है या प्यार,

फर्क तो नहीं जानती।

ऊपर वाला मर्जी जताए,

और मैं इसे तक़दीर मानती।

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